साधारण नियम ( सिविल एवं दाण्डिक ) संसोधन 2020
भाग - 1
प्राथमिक आदेश - 1
1. नाम इन नियमों को साधारण नियम (सिविल एवं दाण्डिक) 2018 कहा जा सकेगा।
2. उपयोजन - ये नियम शासकीय गजट में अधिसूचना के प्रकाशन होने की तारीख से प्रवृत्त होंगे, और राजस्थान उच्च न्यायालय के अधीनस्थ सभी न्यायालयों और अभिकरणों में उक्त तिथि को समस्त विचाराधीन अथवा आरम्भ होने वाले या पश्चात्वर्ती सभी वादों, अपीलों, न्यायालयीन और अन्य विषयों पर लागू होंगे।
3. निरसन -उन मामलों से सम्बन्धित सभी पूर्व नियमों, आदेशों या विनियमों, जिनके लिए इन नियमों में उपबंध किया गया है, एतद्वारा निरस्त किये जाते हैं : परन्तु कि यह निरसन ऐसे निरसित किये गये मामलों, आदेशों या विनियमों के पूर्व प्रवर्तन को या उसके अधीन सम्यक् रूप से किये गये या किये जाने वाले या सहन की गयी किसी भी बात पर प्रभाव नहीं डालेगा।
4. परिभाषाएँ- इन नियमों में,जब तक कि विषय या सन्दर्भ में कोई बात प्रतिकूल न हो,-
(क) "न्यायालय" से अभिप्रेत है और इसमें राजस्थान उच्च न्यायालय के अधीनस्थ प्रत्येक न्यायालय और अभिकरण शामिल है।
(ख) 'संहिता' संहिता से सिविल मामलो में सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 और दाण्डिक मामलों में दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973, समय-समय से यथा संशोधित, अभिप्रेत है।
(ग) इलेक्ट्रानिक रिकार्ड का वही अर्थ होगा जैसा कि इसका सूचना प्रोद्योगिकी अधिनियम, 2000 में दिया गया हैं।
(घ) अभिव्यक्तियां;
(i) जिला न्यायाधीश में अतिरिक्त जिला न्यायाधीश समाविष्ट हैं।
(ii) 'वरिष्ठ सिविल न्यायाधीश' में अतिरिक्त वरिष्ठ सिविल न्यायाधीश समाविष्ट हैं।
(iii) 'सिविल न्यायाधीश' में अतिरिक्त सिविल न्यायाधीश समाविष्ट हैं।
(iv) सत्र न्यायाधीश में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश समाविष्ट हैं।
(v) “मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट" से अभिप्रेत है मुख्य महानगरीय मजिस्ट्रेट/ अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अतिरिक्त मुख्य महानगरीय मजिस्ट्रेट हैं।
(vi) “न्यायिक मजिस्ट्रेट" से अभिप्रेत है महानगरीय मजिस्ट्रेट /अतिरिक्त न्यायिक मजिस्ट्रेट अतिरिक्त महानगरीय मजिस्ट्रेट हैं।
(vii) "मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट" मुख्य महानगरीय मजिस्ट्रेट, मजिस्ट्रेट/ और इसके बाद प्रयुक्त की गई अन्य अभिव्यक्तियाँकिन्तु परिभाषित नहीं की गई हैं का वही अर्थ होगा जैसा कि दण्ड प्रक्रिया संहिया में परिभाषित किया गया हैं।
(ड.) “प्रारूप से अभिप्रेत है इन नियमों में विनिर्दिष्ट प्रारूप हैं।
(च) "सरकार" से राजस्थान राज्य की सरकार अभिप्रेत है।
(छ) 'उच्च न्यायालय' से अभिप्रेत है राजस्थान उच्च न्यायालय का न्यायाधिकरण ।
(ज) 'न्यायिक अधिकारी' से अभिप्रेत है उच्च न्यायालय के अधिनस्थ न्यायालय या अभिकरण, यथास्थिति का पीठासीन अधिकारी ।
(झ) स्वापक औषधि और मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम से अभिप्रेत है, स्वापक औषधि औरमनः प्रभावी पदार्थ अधिनियम, 1985 समय समय पर यथा संशोधित की धारा 2 में परिभाषित स्वापक औषधि और मनःप्रभावी पदार्थ ।
(ञ) 'पैरोकार' (प्लीडर) से अभिप्रेत है सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 2 (15) के अधीनपरिभाषित ।
(ट) 'वरिष्ठ मुंसरिम' में सम्मिलित है मुंसरिम अथवा (वाइस वसा) विपर्ययेन ।
(ठ) राज्य से आशय राजस्थान राज्य ।
5. कार्यालय औरन्यायालय का समय -
(1) कार्यालय एवं न्यायालय के समय के संबंध में प्रावधान राजस्थान उच्च न्यायालय द्वारा समय समय पर जारी की गई अधिसूचना के अनुसार होंगे।
(2) न्यायालयों के कार्यालय में कार्य का समय प्रातः 10.00 बजे से सायं 5.00 बजे तक साथ मेंमध्याह्न भोजन दोपहर 1.30 बजे से 2.00 बजे तक तथा ग्रीष्मकाल में प्रात 7.30 बजे से 1.00 (दोपहर)बजे तक साथ में चाय के समय प्रातः 10.00 बजे से प्रातः 10.15 बजे तक यदि उच्च न्यायालय के विशेष अथवा सामान्य आदेशानुसार सुबह के समय का पालन किया जाता है।
(3) न्यायाधीशों की दैनिक बैठकन्यायालयों में कार्य की अवधि निम्न प्रकार होगी- प्रातः 10.00 बजे से प्रातः 10.30 बजे तक चैम्बर में प्रातः 10.30 बजे से मध्याह्न 1.30 बजे तक न्यायालय में मध्याह्न 1.30 बजे से 2.00 बजे तक दोपहर का भोजन मध्याह्न 2.00 बजे से मध्याह्न 4.30 बजे तक न्यायालय में मध्याह्न 4.30 बजे से मध्याह्न 5.00 बजे तक चैम्बर में ग्रीष्म ऋतु में, यदि उच्च न्यायालय के द्वारा प्रात:कालीन समय पालन करने के आदेश हों तो कार्यसमय अवधि निम्नानुसार होगी- प्रातः 7.30 बजे से 8.00 बजे तक चैम्बर में प्रात: 8.00 बजे से मध्याह्न 10.00 बजे तक न्यायालय में मध्यकालीन चाय प्रातः 10.00 बजे से प्रातः 10.15 बजे तक प्रातः 10.15 बजे से मध्याह्न 12.30 बजे तक न्यायालय में प्रातः 12.30 बजे से 1.00 बजे तक चैम्बर में परन्तु पीठासीन अधिकारी न्यायालय का निर्धारित कार्य निपटाने के पश्चात् अपने चैम्बर में जा सकेगा लेकिन काम के घण्टों की समाप्ति तक चैम्बर में उपलब्ध रहेगा। परन्तु यह भी कि पीठासीन अधिकारी अपने विवेक से चैम्बर की बैठक के लिए नियत समय पर न्यायालय में भी बैठ सकेगा। परन्तु यह भी कि आवश्यक कार्य को किये जाने के लिये कार्यालय/न्यायालय के सामान्य समय या अवकाश के दिन से परे कोई रूकावट नहीं होगी।
6.प्रशासनिक नियन्त्रण-उच्च न्यायालय के अधीक्षण में इससे संबंधित किसी अधिनियम अथवा नियमों के अन्तर्गत जिला एवं सेशन न्यायाधीश समस्त सिविल न्यायालयों में सम्मिलित है अपर जिलान्यायाधीश जो कि इसके स्थानीय परिसीमा के क्षेत्राधिकार में हो ।
7. प्रभारी अधिकारीगण - जिला न्यायाधीश के अधीनस्थ सामान्य नियन्त्रण और पर्यवेक्षण के अधीन अभिलेखालय, अमीन, प्रतिलिपि विभाग, मालखाना, लेखानुभाग, संस्थापन अनुभाग जो कि वहाँ के मुख्यालय पर स्थित अथवा कोई भी अन्य स्थान जहाँ दो या अधिक सिविल न्यायालय स्थित हों, वे जिला न्यायालय द्वारा मनोनीत न्यायिक अधिकारी होंगे। तथापि केन्द्रीय नजारत साधारणतया किसी वरिष्ठ न्यायिक अधिकारी के अधीन रखे जायेंगे।
8. कर्मचारीगण की उपस्थिति पंजिका - वरिष्ठ मुंसरिम अथवा रीडर यथास्थिति कर्मचारीगण की उपस्थिति पंजिका का विहित प्ररूप (पंजिका सं. 1) संधारण करेगा और इसे प्रत्येक सोमवार को पीठासीन अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत करेगा और यदि सोमवार को अवकाश हो तो अगले कार्य दिवस को । पीठासीन अधिकारी कम से कम महीने में एक बार उपस्थिति पंजिका का आकस्मिक निरीक्षण भी करेगा जिससे उसे स्वयं को कार्यालय समय की पाबन्दी की अनुपालना किये जाने की यथोचित जानकारी होसके। वह कार्यालय तथा न्यायालय के समय की पाबन्दी के संधारण तथा अनुपालना के संबंध में जिला न्यायाधीश को त्रैमासिक प्रतिवेदन प्रस्तुत करेगा।
9.लिपिकों द्वारा अभिलेख नहीं ले जाना - लिपिकगण अभिलेख अपने आवास पर नहीं ले जाएंगे तथा अपना कार्य कार्यालय समय में न्यायालय भवन में पूर्ण करेंगे।
10. प्रशासनिक कार्य - जबकि उपर्युक्त समय में किये जाने के लिए न्यायिक कार्य हो तो समस्त प्रशासनिक कार्य का संचालन उक्त समय के बाद पीठासीन अधिकारी के अनुकक्ष में किया जायेगा। 11. अवकाश के दिन कार्य - किसी वाद, मामला अथवा आवेदन को अवकाश के दिन नहीं सुना जायेगा : परन्तु न्यायालय न्याय के हित में अविलम्ब अपेक्षित आदेश देने से इन्कार नहीं कर सकता है।
11. अवकाश के दिन कार्य - किसी वाद, मामला अथवा आवेदन को अवकाश के दिन नहीं सुना जायेगा : परन्तु न्यायालय न्याय के हित में अविलम्ब अपेक्षित आदेश देने से इन्कार नहीं कर सकता है।
12. अवकाश घोषित होने के दिन की सुनवाई - यदि कोई मामला सुनवाई के लिए नियत हो,न्यायालय नहीं बैठता है, उस दिन अवकाश होने का पता बाद में लगे अथवा अवकाश घोषित हो जाये मामले की सुनवाई अगले दिन होगी जिस दिन न्यायालय बैठता है। मामले की सुनवाई अगले दिन होगी जिस दिन न्यायालय बैठता है।
13. पीठासीन अधिकारी की उपस्थिति पंजिका - प्रत्येक पीठासीन अधिकारी विहित प्ररूप (पंजिका सं. 201) में उपस्थिति पंजिका स्वयं रखेगा और प्रत्येक माह के अन्त में हस्ताक्षरित करेगा, परन्तु यदि पीठासीन अधिकारी का माह के दौरान स्थानान्तरण, हो जाता है, वह कार्यालय में उपस्थित होने के अन्तिम दिन पंजिका में हस्ताक्षर करेगा, बजाय उस माह के अन्त में। जिला न्यायाधीश अपनी पंजिका (पंजिका सं. 201) की सत्य प्रति माह के अन्त में उच्च न्यायालय को अग्रेषित करेगा और रिपोर्ट (रिपोर्ट सं.2) भी करेगा कि अधीनस्थ न्यायालयों में माह के दौरान न्यायालय समय की अनुपालना की हुई है। मुख्यालय पर समस्त अधीनस्थ न्यायालयों की पंजिकाएँ और बाहर के न्यायालयों की पंजिकाओं की सत्य प्रतियाँ प्रत्येक माह के अन्त में जिला न्यायाधीशों को प्रस्तुत की जायेंगी। जिला न्यायाधीश अधीनस्थ न्यायालय द्वारा समय की अनुपालना के लिए आवश्यक आदेश पारित कर सकेगा और यदि यह आवश्यक समझे तो ऐसी पंजिकाएँ अथवा प्रतिलिपियाँ केवल उच्च न्यायालय को अग्रेषित करेगा।
14. दैनिक वाद सूची - सुनवाई के दिन के लिए नियत वादों की सूची विहित प्ररूप (प्र. 101) में तीन प्रतियों में सुपाठ्य रूप में हिन्दी में बनाई जाएगी। यह न्यायालय के रीडर द्वारा हस्ताक्षरित होगी और पहले दिन न्यायालय भवन में सूचना पट्ट पर सहज दृश्य स्थान में प्रदर्शित की जावेगी। वाद सूचियों की एक प्रति सुनवाई के समय पीठासीन अधिकारी के पास रखी जायेगी और तीसरी प्रति रीडर के पास रहेगी। सूची तैयार करने में ऐसे मामलों को प्राथमिकता दी जायेगी जो कालानुक्रम से पुराने हों। उन मामलों को भी प्राथमिकता दी जायेगी जो पुराने सुनवाई के हों अथवा गत दिवस में सुनवाई स्थगित की गई हो। पीठासीन अधिकारी के आदेश के बिना मामलों की प्रविष्टि में क्रम से भिन्न नहीं रखे जायेंगे। सातवें स्तम्भ में अंकित किया जायेगा कि प्रत्येक वाद किस प्रयोजन के लिए न्यायालय के समक्ष रखा जाना है, उदाहरण के तौर पर क्या विवाद्यक निर्धारण हेतु अथवा साक्ष्य लिपिबद्ध करने के लिए अथवा अन्तिम निस्तारण हेतु या बहस के लिए अथवा निर्णय सुनाने के लिए। रीडरदैनिक वाद सूची की पत्रावली संधारित करेगा जो कि एक वर्ष के लिए सुरक्षित होगी और अगले कैलेण्डर वर्ष की समाप्ति पर नष्ट की जायेगी।
15. आवेदन-पत्र प्रस्तुत करने का समय - जिला न्यायाधीश समय निश्चित करेगा, जिसकी सूचना सूचना पट्ट पर चस्पा की जायेगी,स्वयं के न्यायालय और अपने अधीनस्थ न्यायालयों के लिए आवेदन पत्र इत्यादि न्यायालय के पीठासीन अधिकारी को प्रस्तुत करने के लिए विशेष आदेश के अभाव में आवेदन-पत्र इत्यादि न्यायालय के बैठने के प्रारम्भ में 10.30 प्रातः (अथवा 7.30 प्रातः सुबह के समय में) और न्यायालय के समय 4.30 अपरान्ह में प्रस्तुत किये जायेंगे।
16. रबर की मुद्राएँ प्रतिषिद्ध हैं- न्यायिक आदेश के लिए विधि अथवा नियमों के द्वारा अपेक्षित हस्ताक्षर हेतु रबर की मुद्राओं का उपयोग निषिद्ध होगा।
17. क्षेत्राधिकार की सारणी- प्रत्येक न्यायालय कक्ष में सहज दृश्य स्थान पर एक सूचना सारणी के रूप में स्थित रहेगी। आर्थिकक्षेत्रीय क्षेत्राधिकार जो राज्य सरकार और उच्च न्यायालय द्वारा जो समय-समय पर संबंधितन्यायालय का व. मुंसरिम अथवा रीडर जो भी दशा हो, क्षेत्राधिकार की सारणी में संधारण के लिए उत्तरदायी होगा।
18.जिला न्यायाधीशों की अनुपस्थिति - जब कभी अपर जिला न्यायाधीशों अथवा व. सिविल न्यायाधीश जिला न्यायालय के कार्यालय का प्रभार ग्रहण करता है और राजस्थान सिविल न्यायालय अध्यादेश (सं. 7 सन् 1950) धारा 11 जबकि वह अपने प्रसामान्य कार्य के अतिरिक्त ऐसे कार्यालय का जिला न्यायाधीश का प्रभारी है चालू दैनिक कार्य करेगा और जिला न्यायाधीश से संबंधित फाईल में अविलम्ब दीवानी मामलों में अंततिम न्यायिक आदेश पारित कर सकेगा। परन्तु ऐसे आदेश पारित करते समय, अपर जिला न्यायाधीश या व. सिविल न्यायाधीश, जैसी भी दशा हो निर्देशन देगा कि ज्योंहि जिला न्यायाधीश सम्भवतः पुनः कार्य पर उपस्थित होवे अथवा पद ग्रहण करे उसके समक्ष अन्तिम आदेशार्थ रखा जाए, जिला न्यायाधीश उस पर ऐसे आदेश पारित करेगा जो वह न्यायसंगत तथा उचित समझे ।
19. अधिकारियों और अधिवक्ताओं के लिए न्यायालय की पोशाक - सिविल न्यायालयों के पीठासीन अधिकारियों द्वारा ऐसे न्यायालयों में विधि व्यवसाय करने वाले अधिवक्ताओं और अभिवक्ताओं द्वारा निम्नलिखित सुभिन्न परिधान पहने जायेंगे :-पट्टियों (बैण्ड) सहित काला कोट (बन्द कालर या खुले कालर का) या अचकन, काले कोट के साथ सफेद कमीज और सफेद काली/स्लेटी/काली और सफेद धारीदार पतलून और अचकन के साथ चूड़ीदार पायजामा या सफेद काली/सिलेटी काली और सफेद धारीदार पतलून । महिला पीठासीन अधिकारियों और सिविल न्यायालयों के समक्ष उपस्थित होने वाली महिला अधिवक्ताओं द्वारा किनारी रहित या शालीन किनारीदार सफेद साड़ी और सफेद ब्लाउज या सफेद सलवार कुर्त्ता साथ ही सफेद पट्टियों (बैण्ड) सहित खुले गले या खुले कालर का काला कोट पहना जावेगा। लोक अभियोजक / सहायक लोक अभियोजक की पोशाक काला कोट (बन्द कालर या खुले कालर का) या काली अचकन पट्टियों (बैण्ड) सहित, सफेद कमीज के साथ सफेदकाली/ स्लेटी/काली और स्लेटी धारीदार पतलून । यदि खुले कालर का काला कोट पहना हो, तब काली टाई पहनी जायेगी। न्यायालयों के समक्ष उपस्थित होने वाली महिला लोक अभियोजक/ सहायक लोक अभियोजक द्वारा किनारी रहित या शालीन किनारीदार सफेद साड़ी और सफेद ब्लाउज या सफेद सलवार - कुर्ता खुले गले या खुले कालर या बन्द कालर का काला कोट पहना जावेगा।

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